शिवसेना के 60 वर्ष: 'मराठी मानुष' से राष्ट्रीय क्षितिज तक का ऐतिहासिक सफर— स्नेहल करमरकर (प्रदेश उपाध्यक्ष, शिवसेना उत्तर प्रदेश

बृज बिहारी दुबे
By -

19 जून 1966 को मुंबई के एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ संगठन आज भारतीय राजनीति का एक ऐसा बरगद का पेड़ बन चुका है, जिसकी गूंज देश की संसद तक सुनाई देती है। व्यंग्यचित्रकार (कार्टूनिस्ट) वंदनीय बालासाहेब ठाकरे द्वारा बोया गया शिवसेना का यह बीज आज अपने 60वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह छह दशक सिर्फ एक राजनीतिक दल की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह देश के बदलते राजनैतिक परिदृश्य, अस्मिता के संघर्ष और प्रखर हिंदुत्व की राजनीति का जीवंत इतिहास हैं।

*स्थापना का मूल मंत्र और वैचारिक आधार*
1960 के दशक में जब स्थानीय युवाओं में रोजगार और अधिकारों को लेकर भारी असंतोष था, तब बालासाहेब ठाकरे ने जनभावनाओं को पहचानकर 'शिवसेना' की स्थापना की। शुरुआत में यह कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन था, जिसका नारा था—"८० टक्के समाजकारण, २० टक्के राजकारण" (80 प्रतिशत समाजसेवा, 20 प्रतिशत राजनीति)।
1980 के दशक के आते-आते शिवसेना ने अपने एजेंडे का विस्तार किया और मराठी अस्मिता के साथ-साथ 'प्रखर हिंदुत्व' को अपनी मुख्य विचारधारा के रूप में अपनाया। बालासाहेब का हिंदुत्व कभी पीठ दिखाने वाला नहीं, बल्कि सीना तानकर समाज की सेवा करने वाला और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला था। इसी प्रखर राष्ट्रवाद की बदौलत शिवसेना ने देश की राजनीति में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बनाई।

*क्षेत्रीय सीमाओं को लांघता शिवसेना का कारवां*
अक्सर राजनैतिक विश्लेषक शिवसेना को केवल महाराष्ट्र और मुंबई केंद्रित पार्टी मानने की भूल करते हैं, लेकिन आज वह दौर पुराना हो चुका है। 60वें वर्ष में प्रवेश करते हुए शिवसेना ने अपनी क्षेत्रीय पहचान की सीमाओं को तोड़ दिया है।

"आज शिवसेना महाराष्ट्र के बाहर उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत देश के २३ राज्यों में अपना संगठन तेजी से मजबूत कर रही है। पार्टी ने एक बहुत स्पष्ट और बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है—आने वाले 4 से 5 साल के भीतर शिवसेना एक आधिकारिक 'राष्ट्रीय पार्टी' (National Party) बनने जा रही है।"
— स्नेहल करमरकर, प्रदेश उपाध्यक्ष, शिवसेना उत्तर प्रदेश

यह विस्तार इस बात का प्रतीक है कि बालासाहेब ठाकरे के विचार आज देश के कोने-कोने में, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के गांवों और कस्बों में आम जनमानस और युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं।

*चुनावी रणक्षेत्र में नई हुंकार*
शिवसेना अब केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं रहने वाली है, बल्कि देश के राजनैतिक पटल पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। पार्टी की नई रणनीति के तहत, आने वाले समय में कई राज्यों के आगामी चुनावों में शिवसेना अपने प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारेगी और पूरी मजबूती से चुनाव लड़ेगी।

उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में हर जिले, हर तहसील और हर बूथ स्तर तक कैडर को पुनर्गठित किया जा रहा है। युवाओं और महिलाओं को संगठन में बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, ताकि जब प्रत्याशी मैदान में उतरें, तो उनके पीछे एक अनुशासित और ऊर्जावान सांगठनिक ताकत खड़ी हो।

*60वें वर्ष की चुनौतियां और संकल्प*
यह सच है कि साल 2022 के बाद पार्टी के भीतर कुछ सांगठनिक बदलाव और खींचतान देखने को मिली, लेकिन इतिहास गवाह है कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं, नेता आते-जाते हैं, परंतु 'शिवसैनिक' और 'शिवसेना का विचार' हमेशा अमर रहता है। उत्तर प्रदेश का शिवसैनिक आज भी उसी निष्ठा और संकल्प के साथ मैदान में डटा हुआ है।

60वें स्थापना दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर उत्तर प्रदेश इकाई का स्पष्ट संदेश है कि असली शिवसेना वही है जो जमीनी स्तर पर जाकर जनता के सुख-दुख का साथी बने। यह 60वां वर्ष आत्ममंथन का नहीं, बल्कि महासंकल्प का वर्ष है।

*निष्कर्ष*
अपने छह दशकों के सफर में शिवसेना ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, सत्ता के शिखर को छुआ है और कई वैचारिक मोर्चों पर खुद को साबित किया है। आज 2026 में, जब पार्टी अपने 60वें वर्ष का उत्सव मना रही है, तब उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक फैला इसका सांगठनिक जाल यह साबित करता है कि शिवसेना का भविष्य और भी व्यापक होने जा रहा है। शोषितों की आवाज बनने, समाजसेवा को सर्वोपरि रखने और देश को एक प्रखर राष्ट्रवादी विकल्प देने के संकल्प के साथ शिवसेना का यह कारवां राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर मजबूती से अग्रसर है।
जय महाराष्ट्र! जय उत्तर प्रदेश! जय हिन्दूराष्ट्र!

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn more
Ok, Go it!