दरिद्रता से भी अधिक खतरनाक है वह पिछड़ापन, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता। अगर सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर भी 'दीन-हीन' का ठप्पा लगा रहे, तो यह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए सोचने का विषय है।"
एक तरफ देश को विकसित बनाने के दावे हैं, दूसरी तरफ हक मारने की यह राजनीति। जब सांसद, विधायक और मंत्री बनकर भी 'दलितपन' या 'पिछड़ापन' नहीं जाता, तो सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच उत्थान के लिए है या सिर्फ दूसरों का हिस्सा खाने के लिए? दुनिया आविष्कार कर रही है और हम अपनी पहचान को पीछे धकेलने में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। उक्त बाते सवर्ण आर्मी भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज प्रसाद चौबे ने परशुराम जयंती मनाई जाने हेतु आयोजित बैठक में कही भारतीय राजनीत के रंग मंच पर एक ऐसा प्रहसन चल रहा है जिसे देख कर शर्म को भी शर्म आ जाए। सत्ता के गलियारे में अति पिछड़ा होने की ऐसी होड़ मची है मानो प्रधानमंत्री का पद कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि वंचित होने सर्टिफिकेट बांटने वाली खिड़की हो। सत्ता की धूर्तता नीला चोला 14 अपील को सरकारी खर्च पर जिस तरह से नीली मोहब्बत का भव्य प्रदर्शन किया गया वह भाजपा के वैचारिक दिवालिए पन का प्रमाण है जो कल तक सपा के पीडीए को कोसते थे आज वे खुद अति पिछड़ा कार्ड खोल कर उसी राह पर रेंग रहे हैं यह महज इत्तेफाक नहीं बल्कि सुनियोजित पॉलिटिकल पाखण्ड है 24 साल तक सत्ता के सराओच्चा शिखर पर विराजमान रहने वाला व्यक्ति जो हजारों करोड़ों के विमानों में बदलने का कार्य करता हो वह खुद को "अति पिछड़ा कह कर उन कारणों लोगों के मुंह पर तमाचा मार रहा है जो वास्तव में गरीबी रेखा के नीचे सड़ रहे हैं
