भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पीरियड लीव (मासिक धर्म अवकाश) की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक टिप्पणी की। कोर्ट का तर्क बड़ा ही प्रैक्टिकल है और थोड़ा डराने वाला भी - अगर हम पीरियड लीव को अनिवार्य कर देंगे तो कंपनियां महिलाओं को नौकरी पर रखने से ही हाथ खींच लेंगी। यह टिप्पणी जो कोर्ट की 'चिंता' है, वह हमारी कॉर्पोरेट मानसिकता का 'आईना' है, यह समझना ज़रूरी है। कोर्ट ने गेंद सरकार के पाले में डाल दी है, यह कहते हुए कि यह नीतिगत मामला है। लेकिन क्या वाकई एक जैविक प्रक्रिया यानी Biological Process के लिए छुट्टी मांगना महिलाओं के पूरे करियर के लिए आत्मघाती कदम है? आइए, दुनिया के नक्शे पर नज़र दौड़ाते हैं और देखते हैं कि क्या वाकई पीरियड लीव देने से कंपनियां 'कंगाल' हो जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की आशंका अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन दुनिया के कई देश इस ‘डर’ को पीछे छोड़ चुके हैं। स्पेन इस मामले में ट्रेंडसेटर है। 2023 में स्पेन यूरोप का पहला देश बना जिसने Paid menstrual leave (पेड मेंस्ट्रुअल लीव) को कानूनी मान्यता दी। दिलचस्प बात यह है कि स्पेन ने इसका हल वही निकाला जो भारत के डर को खत्म कर सकता है, छुट्टी का पैसा कंपनी नहीं, बल्कि सरकार का सोशल सिक्योरिटी सिस्टम भरता है। जब जेब से पैसा नहीं जाता, तो कंपनी को महिला कर्मचारी से कोई परहेज नहीं होता। जापान में 1947 से यह कानून है। वहां का वर्क कल्चर दुनिया में सबसे कठिन है। हालांकि, वहां सोशल स्टिग्मा के कारण महिलाएं इसका इस्तेमाल कम करती हैं, यानी ताने कसने वाले वहां भी कम नहीं। लेकिन कानून का होना ही अपने आप में एक सुरक्षा कवच है। इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी यह प्रावधान बरसों से है। इंडोनेशिया में हर महीने दो दिन की छुट्टी का प्रावधान है। डेटा बताता है कि इन नियमों के बावजूद वहां मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में महिलाएं रीढ़ की हड्डी बनी हुई हैं।
भारत के कुछ प्रोग्रेसिव सोच वाले स्टार्ट-अप्स और बड़ी कंपनियों ने इस ‘पैंडोरा बॉक्स’ को खोलने की हिम्मत दिखाई है। Zomato ने 2020 में साल में 10 दिन की पीरियड लीव का ऐलान किया। दीपिंदर गोयल ने साफ़ कहा कि इसमें शर्माने जैसी कोई बात नहीं है। क्या ज़ोमैटो ने महिलाओं को काम पर रखना बंद कर दिया? बिलकुल नहीं। उनके यहां महिला वर्कफ़ोर्स में इजाफा ही हुआ है। ज़ोमैटो को देख Swiggy और कई और कंपनियों ने भी अपने वर्क कल्चर को Women-Friendly बनाया है। कर्नाटक सरकार ने भी महीने में एक दिन की पीरियड लीव का प्रावधान रखा है।
कंपनियों का डर अक्सर Productivity को लेकर होता है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। एक रिसर्च के मुताबिक, जब कर्मचारी दर्द या बीमारी में काम पर आता है, तो उसकी उत्पादकता 33% तक गिर जाती है। पीरियड के असहनीय दर्द (Dysmenorrhea) में काम करना केवल 'डेस्क भरने' जैसा है, काम करने जैसा नहीं। एक दिन की छुट्टी कर्मचारी को बेहतर रिकवरी और अगले दिन दोगुनी ऊर्जा से काम करने की मानसिक शांति देती है। जो महिला कर्मचारी यह महसूस करती हैं कि उनकी कंपनी उनकी बायोलॉजिकल जरूरतों का सम्मान करती है, उनके नौकरी छोड़ने की संभावना 40% तक कम हो जाती है। भर्ती की प्रक्रिया और ट्रेनिंग पर होने वाले लाखों के खर्च को देखते हुए, एक दिन की छुट्टी देना कंपनी के लिए 'सस्ता' सौदा है।
कोर्ट की यह चिंता कि कंपनियां महिलाओं को नौकरी नहीं देंगी, हमारे समाज की पुरुष प्रधान सोच पर करारा व्यंग्य है। यह वैसा ही तर्क है जैसा कभी मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) के समय दिया गया था। तब भी कहा गया था कि 6 महीने की छुट्टी दोगे तो कौन रखेगा महिलाओं को? आज मैटरनिटी लीव एक अधिकार है और महिलाएं आज भी फाइटर जेट उड़ा रही हैं और इसरो में रॉकेट लॉन्च कर रही हैं।
जब हम पीरियड लीव की बात करते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत सरकार ने पहले ही मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) और चाइल्ड केयर लीव (CCL) के जरिए महिलाओं के वर्कफ़ोर्स में बने रहने के लिए दुनिया के सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक बनाया है- मातृत्व अवकाश संशोधन अधिनियम, 2017 (Maternity Benefit Act) भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां सबसे लंबी पेड मैटरनिटी लीव दी जाती है। इसे 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते (6 महीने) कर दिया गया है। जब यह कानून आया था, तब भी यही शोर मचा था कि अब महिलाओं को नौकरी कौन देगा? लेकिन आज बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां इसे अपनी 'डायवर्सिटी पॉलिसी' का गौरव मानती हैं। कई कंपनियां तो अब 6 महीने से भी ज्यादा की छुट्टी देने लगी हैं। दूसरा कदम है चाइल्ड केयर लीव (Child Care Leave - CCL) इसके तहत महिला सरकारी कर्मचारी अपने पूरे करियर के दौरान बच्चों की देखभाल (पढ़ाई, बीमारी, परीक्षा आदि) के लिए अधिकतम 730 दिनों (2 साल) की छुट्टी ले सकती हैं।
विडंबना देखिए, हम उस देश में रहते हैं जहां एक महिला को
मां बनने के लिए 6 महीने की छुट्टी देने पर समाज गर्व करता है, लेकिन उसी मातृत्व की जैविक नींव यानी मासिक धर्म के लिए
एक दिन की राहत देने पर हमें डर लगता है कि अर्थव्यवस्था
डूब जाएगी। अब समय आ गया है कि पीरियड लीव को भी
'सुविधा' के बजाय 'स्वच्छता और स्वास्थ्य अधिकार' के रूप में देखा जाए।
जेंडर इक्वॉलिटी यानी लैंगिक बराबरी का मतलब 'एक जैसा होना' नहीं, बल्कि 'जरूरतों के हिसाब से मौके' देना है। अगर पुरुष और महिला की शारीरिक संरचना अलग है, तो उनके लिए नियम एक जैसे कैसे हो सकते हैं? यह तो वैसा ही हुआ जैसे कि एक मछली और एक बंदर को पेड़ पर चढ़ने की रेस में लगा दिया जाए। सबसे बड़ी और अहम बात कि अगर एक कंपनी सिर्फ इसलिए महिला को नौकरी नहीं देती क्योंकि उसे महीने में एक दिन का 'बायोलॉजिकल ब्रेक' चाहिए, तो दोष उस महिला की शारीरिक संरचना का नहीं, बल्कि उस कंपनी के 'बिज़नेस एथिक्स' का है। क्या हम इतने कमज़ोर आर्थिक ढांचे पर खड़े हैं कि एकाध दिन की छुट्टी पूरी अर्थव्यवस्था को हिला देगी?
अगर सरकार पीरियड लीव को कंपनियों के लिए 'बोझ' बनाने के बजाय 'सहयोग' का हिस्सा बनाए, तो कंपनियों का डर खत्म हो जाएगा। स्पेन (Spain) का मॉडल इसका सबसे सटीक उदाहरण है, जहां छुट्टी का आर्थिक भार कंपनी नहीं, बल्कि सरकार का सोशल सिक्योरिटी सिस्टम उठाता है। भारत में भी इसे टैक्स छूट (Tax Rebate) या सरकारी सब्सिडी से जोड़ा जा सकता है। जब कंपनी की जेब से पैसा नहीं जाएगा, तो वे महिलाओं की भर्ती में भेदभाव नहीं करेंगी। इसके अलावा, पीरियड लीव का मतलब हमेशा पूरे दिन
की छुट्टी नहीं होना चाहिए। रिसर्च बताती है कि 60% से अधिक महिलाएं पूरी छुट्टी के बजाय उस दिन घर से काम (Work From Home) करना पसंद करती हैं। पीरियड लीव को केवल पीरियड्स तक सीमित न रखकर इसे Menstrual Wellness या Self-Care Day के रूप में पेश करना चाहिए। इससे कॉर्पोरेट जगत में इसके प्रति जुड़ी 'शर्म' (Stigma) खत्म होगी।न।
