भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल ) के संस्थापक एके बिंदुसार की कलम से..
"प्रेस (PRESS) पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस" का पूर्ण रूप मीडिया या पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई औपचारिक या सर्वमान्य परिभाषा नहीं है।
यह संभवत प्रेस शब्द को एक सकारात्मक सामाजिक जिम्मेदारी देने के उद्देश्य से एक वैकल्पिक सटीक उदाहरण है, जो मीडिया की समाज सेवा और आपातकालीन स्थितियों में जनता से जुड़े कार्यों पर जोर देता है।
यदि हम इस अनौपचारिक परिभाषा को स्वीकार करते हैं, तो यह मीडिया की निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाओं को दर्शाता है:
1-पब्लिक रिलेटेड (Public Related): जनता से जुड़े मुद्दों और सरोकारों पर ध्यान केंद्रित करना।
2- इमरजेंसी (Emergency): प्राकृतिक आपदाओं, स्वास्थ्य संकटों या कानून व्यवस्था की स्थितियों में त्वरित और विश्वसनीय जानकारी देना।
3- सोशल सर्विस (Social Service): सूचना और जागरूकता के माध्यम से समाज की सेवा करना।
*लोकतंत्र की व्यवस्था सुधारने में 'सामाजिक सेवा' के रूप में प्रेस का महत्व*
यदि हम प्रेस को एक 'पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस' के रूप में देखते हैं, तो इसकी भूमिका लोकतंत्र को सुधारने और मजबूत करने के लिए अत्यंत अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि यह केवल खबर नहीं देता, बल्कि संकट में जनता की मदद भी करता है।
1. संकट काल में जीवन रक्षक सूचना (Life-Saving Information in Crisis)
यह प्रेस की सबसे बड़ी "इमरजेंसी सोशल सर्विस" है।
आपदा प्रबंधन: भूकंप, बाढ़, महामारी (जैसे COVID-19) या अन्य आपदाओं के दौरान, प्रेस सुरक्षित स्थानों, सरकारी निर्देशों और आवश्यक सेवाओं (अस्पताल, राहत शिविर) की तत्काल जानकारी देकर लाखों लोगों का जीवन बचाने में मदद करता है।
अफवाहों पर नियंत्रण: संकट के समय फैली अफवाहों को सत्य और तथ्यपरक जानकारी से प्रतिस्थापित करके समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखता है।
2. वंचितों की आवाज़ और सामाजिक न्याय (Voice of the Voiceless and Social Justice)
प्रेस (पब्लिक रिलेटेड) उन लोगों के मुद्दों को मुख्यधारा में लाता है, जिनकी आवाज़ दबा दी जाती है।
यह सामाजिक बुराइयों (जैसे लिंगभेद, जातिवाद, गरीबी) को उजागर करके सरकार और समाज को उन पर ध्यान देने के लिए मजबूर करता है।
यह जवाबदेही (Accountability) सुनिश्चित करता है कि सरकार की सामाजिक कल्याण योजनाएं सही लाभार्थियों तक पहुँच रही हैं या नहीं।
3. जनता की भागीदारी और सशक्तिकरण (Public Participation and Empowerment)
एक 'सोशल सर्विस' के तौर पर प्रेस, नागरिकों को सशक्त बनाता है।
यह चुनावी प्रक्रियाओं, सरकारी बजटों और कानूनी सुधारों की जानकारी देकर नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देता है।
यह लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करता है, जिससे वे एक सक्रिय और मजबूत लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा बन सकें।
4. पारदर्शिता और भ्रष्टाचार उन्मूलन (Transparency and Anti-Corruption)
प्रेस की निगरानी (Watchdog) की भूमिका यहाँ 'सर्विस' बन जाती है।
भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करके, यह सार्वजनिक धन की सुरक्षा करता है – जो कि देश के नागरिकों के लिए एक बड़ी सामाजिक सेवा है।
जब प्रेस अपनी स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखते हुए एक 'पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस' की भावना से काम करता है, तो यह लोकतंत्र के तीनों स्तंभों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) की विफलताओं को दूर कर, जनता के हित में व्यवस्था को सुधारने और मजबूत करने के लिए एक अपरिवर्तनीय शक्ति बन जाता है।
भ्रष्टाचार उन्मूलन और ‘सोशल सर्विस’ के रूप में प्रेस की अनिवार्य भूमिका
शीर्षक: जब प्रेस बनता है प्रहरी और सेवक: भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सूचना की शक्ति
भारतीय लोकतंत्र आज दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है: संस्थागत भ्रष्टाचार और जनता की घटती भागीदारी। इसी संदर्भ में, भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल) द्वारा महामहिम राष्ट्रपति महोदया को 'भ्रष्टाचार उन्मूलन एवं लोक जवाबदेही नियमावली' लागू करने बाबत भेजा गया ज्ञापन एक अत्यंत सामयिक और महत्वपूर्ण कदम है। यह ज्ञापन केवल एक मांग नहीं, बल्कि देश के चौथे स्तंभ (प्रेस) की उस 'पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस' की भूमिका की पुष्टि है, जो लोकतंत्र को बचाने और सुधारने के लिए अनिवार्य है।
भ्रष्टाचार उन्मूलन की मांग और प्रेस का दायित्व
भारतीय मीडिया फाउंडेशन से भेजा गया यह ज्ञापन स्पष्ट करता है कि मीडिया केवल खबरें छापने तक सीमित नहीं है; उसका प्राथमिक दायित्व सुशासन और नैतिक व्यवस्था की स्थापना में सक्रिय रूप से योगदान देना है।
भ्रष्टाचार किसी भी लोकतंत्र के लिए एक धीमी ज़हर की तरह है, जो संसाधनों को लूटता है और जनता के विश्वास को तोड़ता है। 'भ्रष्टाचार उन्मूलन नियमावली' की मांग करके, भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी ने सरकार और प्रशासन पर पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने का दबाव बनाया है।
प्रेस की 'सोशल सर्विस' यहाँ शुरू होती है: मीडिया को सिर्फ नियमावली की मांग नहीं करनी है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि:
सूचना का प्रसार: नियमावली लागू होने पर इसकी बारीकियों और जनता के लिए इसके लाभों को हर नागरिक तक पहुँचाया जाए।
सतत निगरानी: यह देखा जाए कि सरकारी विभाग ईमानदारी से इस नियमावली का पालन कर रहे हैं या नहीं।
व्हिसलब्लोअर का संरक्षण: भ्रष्टाचार उजागर करने वाले नागरिकों और कर्मचारियों की आवाज़ को मंच प्रदान किया जाए।
इमरजेंसी सोशल सर्विस: लोकतंत्र में हस्तक्षेप
प्रेस को 'पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस' के रूप में देखना, इसकी पारंपरिक 'निगरानीकर्ता' (Watchdog) की भूमिका को एक सक्रिय 'सेवक' (Servant) की भूमिका में बदल देता है। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार एक 'आपातकाल' (Emergency) है, क्योंकि यह समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों के अधिकारों को छीन लेता है।
इस आपातकाल में प्रेस की भूमिका:
त्वरित रिपोर्टिंग: भ्रष्टाचार के मामलों को तत्काल और बिना किसी लाग-लपेट के उजागर करना।
तथ्यों की शुद्धता: सनसनीखेज रिपोर्टिंग से बचकर, ठोस सबूतों पर आधारित रिपोर्ट देना ताकि कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
जनमत निर्माण: भ्रष्ट आचरण के विरुद्ध एक सशक्त और एकीकृत जनमत तैयार करना, जो नीति-निर्माताओं को कार्रवाई करने के लिए बाध्य करे।
चौथा स्तंभ और लोक जवाबदेही
भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के लिए सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए एक ऐसे जवाबदेह समाज की आवश्यकता है जहाँ नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों। प्रेस का काम इसी जागरूकता को पैदा करना है।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन जैसे संगठन, जमीनी स्तर पर कार्य करके, यह साबित करते हैं कि जब प्रेस एकजुट होकर सामाजिक हित में आवाज उठाता है, तो वह सबसे बड़े नीतिगत परिवर्तनों का उत्प्रेरक बन सकता है।
प्रेस को अब केवल 'खबर देने वाला' नहीं, बल्कि 'सामाजिक परिवर्तन का एजेंट' बनना होगा। यह तभी संभव है जब मीडिया संस्थान स्वतंत्रता, निडरता और विश्वसनीयता के मूल्यों पर टिके रहें और हर रिपोर्ट को एक 'सोशल सर्विस' का हिस्सा मानें। जिस दिन देश का हर नागरिक यह समझेगा कि प्रेस उसकी रक्षा और सेवा के लिए है, उस दिन भ्रष्टाचार के उन्मूलन की राह बहुत आसान हो जाएगी।
