अयोध्या संस्कृत ज्ञान और विज्ञान की अनादि अधिष्ठात्री है। यही वह शाश्वत स्वर है, जिसमें ब्रह्माण्ड का प्रत्येक रहस्य व तत्त्व समाहित है। संस्कृत भारत की आत्मा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में संस्कृत विद्या केंद्रों का अतुलनीय योगदान रहा है। उक्त बातें महापौर अयोध्या धाम गिरीशपति त्रिपाठी नें परिक्रमा मार्ग स्थित महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के सभागार में संस्कृत विद्यालय शिक्षक समिति, उत्तर प्रदेश के द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में 'भारतीय ज्ञान परम्परा के सम्वर्धन में संस्कृत विद्या केन्द्रों का गौरवशाली इतिहास' विषयक आयोजित राष्ट्रीय गोष्ठी में कही।
उन्होंनें कहा कि भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है संस्कृत भाषा। यह विश्व में मानवता के पथ को सदैव आलोकित करने वाली दिव्य ज्योति है।
विशिष्ट अतिथि हिन्दी भाषा के ख्यातिप्राप्त विश्वप्रसिद्ध कवि व समीक्षक डॉ. अष्टभुजा शुक्ल नें कहा कि युगानुकूल संस्कृत वाङ्मय ने मानव सभ्यता को ज्ञान और सत्य के पथ पर अग्रसर किया। जब-जब किसी महापुरुष ने जाति, वर्ण, सम्प्रदाय अथवा देश की सीमाओं को पार कर, ज्ञान की पराकाष्ठा का अन्वेषण किया, तब-तब उन्होंनें संस्कृत वाङ्मय की शरण ग्रहण की। अतः आश्चर्य नहीं कि मैक्समूलर, अरस्तू,पीटर्सन जैसे महान् दार्शनिकों ने इसे विश्व का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रामाणिक ज्ञान का स्रोत स्वीकार किया।
सारस्वत अतिथि इन्द्रासन मिश्र नें कहा कि संस्कृत भाषा ने भारत के प्रत्येक क्षेत्र को अपनी गोद में स्थान दिया। कश्मीर के शारदा पीठ से लेकर कन्याकुमारी तक, द्वारका से लेकर कामाख्या तक—हर क्षेत्र में संस्कृत की वाणी गूँजी। मंदिरों के स्तंभों पर, शिलालेखों में, शास्त्रों और वेदों में—संस्कृत ने उस युग को आत्मीयता का आलोक दिया।
विशिष्ट वक्ता जिला विद्यालय निरीक्षक, अयोध्या पवन कुमार तिवारी ने कहा कि कि हमारे पूर्वजों के पराक्रम, त्याग और अनवरत तप का ही प्रतिफल है कि आज भी यह धरोहर हमारे पास जीवित है। किन्तु स्वातन्त्र्योत्तर भारत में जितनी उपेक्षा इस परम्परा की हुई, उतनी सम्भवतः पराधीनता में भी नही हुई। वैदेशिक विचारधाराओं ने हमारी नव पीढ़ी को अपनी संस्कृति से विमुख किया और हम मानसिक रूप से पाश्चात्य अनुकरण के बन्धन में जकड़ दिये गये।
अतिथि डाॅ. इंद्रासन मिश्र नें कहा कि इन संस्कृत विद्यालयों नेविद्यालयों ने भारत को न केवल विद्वान दिए, बल्कि ऐसे नागरिक भी गढ़े, जिन्होंने संस्कार, संयम और समरसता को जीवन का मूलमंत्र बनाया। इस दृष्टि से संस्कृत विद्यालय केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि संस्कारपीठ है।
उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में जब भौतिकता, प्रतियोगिता और उपभोक्तावाद का प्रभाव बढ़ रहा है, तब संस्कृत शिक्षा का क्षेत्र चुनौतीपूर्ण स्थिति में है। अनेक संस्कृत विद्यालय संसाधनों की कमी, शिक्षकों की न्यूनता, और सामाजिक उदासीनता से जूझ रहे हैं।
किन्तु यह विस्मरण नहीं होना चाहिए।
कार्यक्रम अध्यक्ष पूर्व प्राचार्य अयोध्या धाम डाॅ. विजय शंकर दुबे नें कहा कि भारतभूमि सदैव से ज्ञान और संस्कार की अधिष्ठात्री रही है। यहाँ शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का साध्य मानी गई। भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत हमारे प्राचीन गुरुकुल रहे, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक मानवता को सत्य, धर्म, शील, और विज्ञान का आलोक प्रदान किया।
सारस्वतातिथि भारतभूमि सदैव से ज्ञान और संस्कार की अधिष्ठात्री रही है। यहाँ शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का साध्य मानी गई। भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत हमारे प्राचीन गुरुकुल रहे, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक मानवता को सत्य, धर्म, शील, और विज्ञान का आलोक प्रदान किया।
कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत व प्रस्तावित की संस्कृत विद्यालय शिक्षण समिति के सम्मानित अध्यक्ष डाॅ. गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष राष्ट्रपति पुरस्कृत पूर्व प्राचार्य डाॅ.गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि प्राचीन काल से ही इस प्राच्य भाषा संस्कृत के ज्ञान गङ्गा को अक्षुण्ण बनाये रखने हेतु गुरुकुल-व्यवस्था की स्थापना की गयी जो आज भी निरंतर जारी है। कठिन तप,कठोर अनुशासन और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से इस अमूल्य निधि को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित किया गया। बाह्य आक्रान्ताओं के समय जब ज्ञान-संरक्षण पर संकट आया, तब भी यह धारा सूक्ष्म पथों से प्रवाहित होती रही।
गुरुकुल प्रणाली का आधार सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का सिद्धांत था। इसमें वर्ण, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। आचार्य वाल्मीकि, वेदव्यास, और सन्दीपनि जैसे गुरुओं ने समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर दिए।
कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम सचिव संगठन मंत्री डॉ.अभिषेक पाण्डेय ने किया।
धन्यवाद ज्ञापन समिति के महामंत्री कार्यक्रम संयोजक डा. श्रवण कुमार मणि त्रिपाठी नें किया।
कार्यक्रम का आरंभ वैदिक तथा लौकिक मंगलाचरण से हुआ।
उक्त कार्यक्रम में प्रथम दिन उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से 500 से अधिक शिक्षक तथा प्राचार्य गण उपस्थित रहे।
