रिपोर्ट शिवेंद्र सिंह*
*जौनपुर, 14 अप्रैल आज पूरा देश डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती मना रहा है। जगह-जगह कार्यक्रम, माल्यार्पण और बड़े-बड़े आयोजन हो रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा सवाल भी खड़ा हो रहा है, जो समाज के हर वर्ग, हर जाति और हर राजनीतिक दल को सोचने पर मजबूर करता है।
क्या अंबेडकर जयंती आज एक वर्ग विशेष तक सीमित होती जा रही है?
कई स्थानों पर देखने को मिलता है कि कुछ लोग इस दिन को केवल अपनी जाति या अपने समुदाय का उत्सव मान लेते हैं, जबकि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जो संविधान दिया, वह पूरे देश के लिए है—हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग के लिए समान अधिकारों की बात करता है।
संविधान, जिसे हम सभी मानते हैं, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की भावना है—अगर वह सबका है, तो फिर उनके जन्मदिन को भी सबका होना चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि हम सिर्फ मूर्ति पर फूल चढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके विचारों को समझें और अपनाएं। अंबेडकर ने जिस समाज की कल्पना की थी, उसमें भेदभाव, ऊंच-नीच और जातिवाद के लिए कोई जगह नहीं थी।
लेकिन वर्तमान समय में, जब हम जयंती को भी जातियों में बांटने लगते हैं, तो यह उनके सिद्धांतों के विपरीत नजर आता है।
यह खबर किसी एक वर्ग या समुदाय पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि पूरे समाज से एक अपील करती है—
क्या हम अंबेडकर को केवल नाम से मानते हैं या उनके विचारों को भी अपने जीवन में उतारते हैं?
आज अंबेडकर जयंती के अवसर पर यह आत्ममंथन जरूरी है कि हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ें, जहां जयंती भी सबकी हो और विचार भी सबके हों।
