संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने यहाँ व्याकरण विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष रह चुके प्रोफ़ेसर गिरजेश कुमार दीक्षित के आकस्मिक निधन की सूचना पाकर स्तब्ध और मर्माहत होकर कहा कि व्याकरण के राष्ट्रीय स्तर के अप्रतिम मौलिक विद्वान व्याकरण विभाग के अध्यक्ष एवं वेद वेदांग संकाय के संकायाध्यक्ष रहे प्रोफेसर गिरिजेश कुमार दीक्षित अब पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं। बीते कल दिनांक 12 10.2025 रविवार की शाम 05:00 बजे इनफिनिटी अस्पताल भोजुबीर काशी में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली ।
उनके निधन संस्कृत जगत की अपूरणीय क्षति हुई है।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभाग के आचार्य अध्यक्ष एवं वेद -वेदांग संकाय के संकायाध्यक्ष रहे प्रोफेसर गिरिजेश कुमार दीक्षित ने भारतीय ज्ञान परंपरा की कड़ी में अपना अप्रतिम योगदान किया। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य रहते हुए इन्होंने शिक्षण परंपरा में ऐसे अनेकों योग्य शिष्यों को तैयार किया जो आज भी कुलपति, निदेशक, अध्यक्ष जैसे योग्य पदों पर कर्यरत हैं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के विभिन्न उच्च केंद्रीय समितियों में आपने अध्यक्ष , समन्वयक ,संयोजक एवं सदस्य के रूप में कार्य किया। अनेकों ग्रन्थों का संपादन एवं लेखन का कार्य आपने किया। आपकी सबसे प्रसिद्ध और उत्कृष्ट संपादन कृति 7 टीकाओं वाली श्री दुर्गा सप्तशती है जो वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है, जिस पर आज विविध स्तरों पर शोध हो रहा है। प्रोफेसर कालिका प्रसाद शुक्ल विरचित श्री 'राधाचरित महाकाव्यम्' की टीका एवं संपादन तथा अनुवाद का कार्य आपने किया । प्रोफेसर शुक्ल द्वारा रचित "भास्कर भाव मानव:" स्रोत काव्य की टीका संपादन एवं अनुवाद का कार्य भी आपने किया इसकी टीका का नाम "भानुमति" एवं अनुवाद का नाम "भास्करी" है ।आपके व्याकरण से संबंधित प्रौढ़ ग्रंथ नागेश भट्ट द्वारा लिखित ग्रंथ "परिभाषेन्दुशेखर" की टीका एवं संपादन का कार्य किया। इसके अतिरिक्त अपने गुरु दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य रहे प्रोफेसर विश्वम्भर नाथ त्रिपाठी की पुस्तक "अग्निचयनम्" की भूमिका एवं प्रस्तावना लिखने का कार्य किया। क्योंकि जब यह "अग्निचयनम्" पुस्तक तैयार हो चुकी थी और उसकी भूमिका एवं प्रस्ताव लिखना रह गया था तभी 4 जनवरी 1990 में स्वर्गीय विश्वम्भर नाथ त्रिपाठी जी का देहावसान हो गया । आगे के पुस्तक प्रकाशन के क्रम में प्रस्तावना एवं भूमिका आमुख सहित पुस्तक को प्रकाशित कराया । यह सभी उपर्युक्त पुस्तकें संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हैं।
प्रोफेसर गिरिजेश कुमार दीक्षित ने आज तक भारतीय ज्ञान परंपरा की श्रृंखला में जितना बहुमूल्य योगदान किया है उनको शब्दों में पिरोना अत्यंत कठिन है। प्रोफेसर दीक्षित की सारस्वत साधना की एक सुधीर्घ लंबी परंपरा है ।अनुसंधान के वे महारथी आचार्य थे ।आपके कितने शोध छात्र आज के समय में विभिन्न प्रशासकीय पदों पर कार्यरत हैं। गरीब छात्रों की मदद करना इनका सहज स्वभाव था। प्रोफेसर दीक्षित उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद अंतर्गत ग्राम करजानिया, पत्रालय भूपतिपूरा ,थाना खामपार, ब्लॉक बनकटा, तहसील सलेमपुर के निवासी थे । उनके पिता स्वर्गीय केदारनाथ दीक्षित सलेमपुर देवरिया पाठशाला के संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य रहे । माता स्वर्गीय चंद्रावती देवी एक साधवी गृहणी थी। इनकी सारस्वत यात्रा अनवरत चलती थी रहती थी । घर पर भी जरूरतमंद छात्रों को पढ़ना एवं उनकी सहायता करना उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग था। प्रोफेसर दीक्षित अपना भरा-पूरा परिवार छोड़कर गए हैं वह अपनी सारी जिम्मेदारियां को पूर्ण कर इहलोक से शिवलोक को प्रस्थान किए हैं । उनके निधन से संपूर्ण संस्कृत जगत एवं विश्वविद्यालय परिवार मर्माहत है । इससे संस्कृत जगत की अपूरणीय क्षति हुई है।
