हमारे धर्मशास्त्र महाभारत, रामायण, पुराण आदि हमें बताते हैं कि इस संसार में आदिकाल से राक्षस, दैत्य, पिशाच, म्लेच्छ आदि ऐसे लोग रहे हैं जिन्हें भगवान, सनातन धर्म, यज्ञ, तप, ऋषि-मुनियों, साधु-संतों से द्वेष रहा है।
इस द्वेष के कारण वे इन सबका तिरस्कार करते आए हैं। यज्ञों
का विध्वंस करते आए हैं। आसुरी शक्तियों को दैवीय संपदा
वाले मनुष्य फूटी आंख नहीं सुहाते हैं।
यह सिलसिला इस्लाम के अस्तित्व में आने से और भी तेज हो गया। इस्लाम जब अरब की सीमा से बाहर निकला तो उसने भारत की ओर रुख किया। सिंध पर 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुए अरबी आक्रमण से ही मंदिरों पर आक्रमण होने लगे।
मंदिरों के साथ-साथ सनातन धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराओं को तोड़ा जाने लगा।
धार्मिक साहित्य की होली जलाई जाने लगी। मानवता को
पैरों तले कुचला जाने लगा।
मंदिर न केवल आस्था के केंद्र बिंदु हैं, अपितु 'धर्म' के ध्वजवाहक भी हैं। धर्म का अर्थ है कर्तव्य व कर्म करना मंदिरों से जुड़ने का अर्थ है अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन करते रहना।
मंदिर ध्वंस का उद्देश्य मानमर्दन करना
विधर्मियों ने सनातन संस्कृति को मिटाने के लिए सबसे पहला आक्रमण मंदिरों पर ही किया। मंदिरों पर आक्रमण इसलिए नहीं किया कि वहां अकूत धन-दौलत थी जैसा कि वामपंथी इतिहासकार बताते हैं।
मंदिरों पर आक्रमण करने का एकमात्र उद्देश्य सनातनियों को अपमानित कर उन्हें 'हीन' घोषित करना था।
विधर्मियों की सबसे अधिक भय वेद, पुराण, उपनिषद्, स्मृति एवं अन्य धार्मिक साहित्य से लगता था। तभी तो उन्होंने नालंदा के पुस्तकालय को जलाकर राख कर दिया। उन्हें लगा कि पुस्तकें जला देने से सनातनी संस्कृति, धर्म नष्ट हो जाएगा। लेकिन उन्हें कहां पता था कि सनातनी लोग भी दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। वे सिर दे देंगे किन्तु संस्कृति नहीं देंगे।
सनातनियों ने सिद्ध कर दिया कि उनके धर्म स्थल चाहे हजारों बार टूटे। उनका सामूहिक नरसंहार हुआ। उनके साथ नृशंस अत्याचार हुआ। किन्तु सनातनी राख में से भी उठकर फिर से खड़ा हो गया। चाहे वह महाराणा कुंभा, संग्राम सिंह, महाराणा प्रताप, मालदेव, विक्रमादित्य, छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रसाल, संभाजी राजे, दुर्गावती, गुरु तेगबहादुर सिंह, गुरु गोविन्द सिंह, बंदा बहादुर, महाराजा रणजीत सिंह, पेशवा बाजीराव या गोकुल जाट के रूप में क्यों न हो। उसने हर वक्त अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की और मानवता को जीवित रखने का प्रयास किया।
सोमनाथ मंदिर प्रभास पट्टन तीर्थक्षेत्र
सोमनाथ मंदिर को बार-बार ध्वंस करने और हर बार उसका पुनर्निर्माण करने से सनातनियों के हौसलों के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। सोमनाथ का मंदिर सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है ।
महाभारत, रामायण, शिव पुराण, स्कंद पुराण और श्रीमद्
भागवत पुराण में 'प्रभास पट्टन' तीर्थ क्षेत्र का उल्लेख हुआ है।
सोमनाथ मंदिर गुजरात राज्य में तत्कालीन सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल बंदरगाह के पास कपिला, हिरण और सरस्वती नदी
संगम पर सागर तट पर स्थित है। इस स्थान को ‘प्रभास पट्टन तीर्थ क्षेत्र' कहा जाता था।
प्राचीन काल में यह स्थान न केवल धार्मिक अपितु व्यावसायिक केन्द्र भी था जो दूर-दूर तक विख्यात था । यहाँ पर भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई थी। इसीलिए यह तीर्थं प्राचीन काल से ही सनातनियों की आस्था का केन्द्र बना हुआ था। पहले इसका नाम 'सोमेश्वर' होता था।
जुनैद ने किया ध्वस्त तो नागभट्ट ने कराया पुनर्निर्माण
अरबों के आक्रमण के पश्चात् सन 725 ईस्वी में सिंध के
सूबेदार अल जुनैद ने इसे सर्वप्रथम ध्वस्त किया जिसे प्रतिहार
वंश के राजा नागभट्ट ने सन् 815 ईस्वी में पुनर्निर्माण करा दिया। इसके पश्चात् तो सोमनाथ पर जैसे विधर्मियों ने आक्रमणों की झड़ी लगा दी।
महमूद गजनवी का आक्रमण
विश्व प्रसिद्ध आक्रमण महमूद गजनवी का सन् 1026 ईस्वी में हुआ था जब महमूद गजनवी ने न केवल सोमनाथ मंदिर का विध्वंस किया था अपितु ज्योतिर्लिंगों को पैरों तले भी रौंदा था। इसका पुनर्निर्माण सिद्धराज जयसिंह ने करवाया था।
खिलजी ने भी तुड़वाया था मंदिर
सन् 1299 में अलाउद्दीन खिलजी ने उलूग खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी और इस मंदिर को फिर से ध्वस्त किया गया। लेकिन मंदिर ध्वस्त होने से सनातनियों का हौंसला ध्वस्त नहीं हुआ और राजा महीपाल ने सन् 1308 में इसका पुनः जीर्णोद्धार करवा लिया।
इतिहास साक्षी है कि अलाउद्दीन की सेना जब सोमनाथ मंदिर की मूर्तियों को लेकर जा रही थी तब जालौर राज्य के राजा कान्हड़ देव के नेतृत्व में अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण किया गया और कान्हड़ देव ने मूर्तियों को अपने कब्जे में कर लिया।
औरंगजेब भी पीछे नहीं रहा
बाद में औरंगजेब ने भी सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त करवा दिया था जिसका जीर्णोद्धार मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया। कुल सात बार मंदिर का विध्वंस किया गया था ।
मंदिर सदैव से मार्गदर्शन करने का केंद्र रहे हैं इसलिए इनका
बार-बार जीर्णोद्धार होता रहा है।
स्वाधीनता के बाद पुनर्निमाण, नेहरू जी नहीं चाहते थे
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी सरदार वल्लभ भाई पटेल और
केएम मुंशी ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण करना चाहा और
केबिनेट में इसके लिए बजट की मांग भी की गई लेकिन तब
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसके जीर्णोद्वार के
विरुद्ध थे। इस विषय पर सरदार वल्लभ भाई पटेल और
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी एक तरफ और जवाहरलाल
नेहरू दूसरी तरफ थे।
प्रकरण मोहनदास करमचंद गांधी जी के संज्ञान में लाया गया तब उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी लेकिन गांधी ने भी इस जीर्णोद्धार के लिए सरकारी धन व्यय करने से इंकार कर दिया।
तब तत्कालीन खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री श्री केएम मुंशी
की अध्यक्षता में एक ट्रस्ट का गठन किया गया और मंदिर के
जीर्णोद्धार के लिए हिन्दू जनता से सहयोग मांगा गया।
जनता ने इस कार्य का खुले मन से स्वागत किया और मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए दिल खोलकर धन प्रदान किया। इसी बीच में तत्कालीन गृहमंत्री लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई
पटेल की मृत्यु 15 दिसम्बर, 1950 को हो गई। तब पुनर्निर्माण
का कार्य संभाला केएम मुंशी ने।
नेहरू ने विरोध के लिए सीमा पार की
11 मई, 1951 को प्राण प्रतिष्ठा होना तय हुआ। इसके लिए,
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी स्वीकृति
प्रदान कर दी थी।
इससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र लिखकर उन्हें सावचेत किया कि एक संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति को किसी धार्मिक आयोजन में सम्मिलित नहीं होना चाहिए और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में जाने से रोकते रहे।
राष्ट्र की धर्म निरपेक्ष नीति के संबंध में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद
के विचार जवाहरलाल नेहरू से मेल नहीं खाते थे।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने पत्र का प्रत्युत्तर देते हुए लिखा कि सोमनाथ मंदिर का महत्व धार्मिक आस्था से कहीं बढ़कर है।
यह राष्ट्र के गौरव का प्रतीक है इसलिए हमें उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सम्मिलित होना चाहिए।
जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए निम्न कार्य किए।
1. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखकर
स्पष्ट मना कर दिया कि उन्हें मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम
में भाग नहीं लेना चाहिए।
2. इसके लिए उन्होंने केबिनेट की मीटिंग भी बुलाई और
उसमें राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर नहीं जाने
देने के लिए प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया लेकिन वह स्वीकार नहीं
किया गया।
3. जब किसी भी प्रकार से जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपति डॉ.
राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम
में जाने से नहीं रोक पाए तो उन्होंने एक पत्र लिखकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद को कहा कि यह यात्रा सरकारी नहीं होगी । इसका व्यय राष्ट्रपति को स्वयं उठाना होगा।
इस पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निजी व्यय से ट्रेन से वडोदरा तक गए और वहां से जामनगर के राजा ने कार उपलब्ध करवाई, उससे सोमनाथ मंदिर गए।
4. जवाहरलाल नेहरू ने सौराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को
निर्देश दिए कि वे इस कार्यक्रम के लिए किसी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं करें।
सौराष्ट्र ने इस कार्यक्रम के लिए 5 लाख रुपए देने की घोषणा कर रखी थी लेकिन नेहरू जी के पत्र के पश्चात् वे रुपए कार्यक्रम के लिए नहीं दिए गये।
5. जवाहरलाल नेहरू जी ने 2 मई, 1951 को सभी
मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर उन्हें सावचेत किया कि वे
मंदिरों के कार्यक्रमों में नहीं जाएं और उसके लिए कोई धन
भी नहीं दें।
सभी विरोधों के पश्चात् भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निश्चय पर अड़े रहे और 11 मई, 1951 को मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सम्मिलित होकर उसे अमर बना दिया।
सोमनाथ का मंदिर आज अपनी संस्कृति की एकता का भव्य प्रदर्शन कर रहा है।
विशेष: उस समय से लेकर आज तक क्या कांग्रेस के मुख्यमंत्री और अन्य नेता धर्म विशेष के कार्यक्रमों में सम्मिलित नहीं होते थे, वे हर कार्यक्रम में शामिल होते थे लेकिन नेहरू जी को दिक्कत सिर्फ बहु संख्यक समुदाय से ही क्यों थी।
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