संस्थान के निदेशक प्रोफेसर अजय कुमार शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में बताया के विगत ढाई वर्ष में संस्थान के विकास कार्यों पर सार्थक प्रयास किया गया है। इस अवसर पर संस्थान के कुल सचिव हितेश शर्मा जी भी उपस्थित रहे। डॉ अतुल कोठारी, राष्ट्रीय सचिव शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, राष्ट्रीय संयोजक ए विनोद, संजय स्वामी, राष्ट्रीय सह संयोजक, सुरेश गुप्ता राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष,अथर्व शर्मा, राष्ट्रीय संयोजक प्रचार प्रसार ने मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन कर तथा पुष्प अर्पण कर कार्यशाला का विधिवत शुभारंभ किया। संस्थान के निदेशक एवं कुलसचिव द्वारा अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया गया। अजय शर्मा जी ने बताया कि आदरणीय अतुल कोठारी जी के प्रेरक उद्बोधनों को आभासीय माध्यम पर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली द्वारा उपलब्ध करवाया जाएगा।
कार्यशाला की प्रस्तावना रखते हुए अथर्व शर्मा ने कहा कि राष्ट्र तलवार से नहीं विचारों से बनते हैं। शिक्षा समाज में चिंतन का विषय बने। चिंतन समाज तक पहुंचे। इसी उद्देश्य को लेकर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का प्रचार प्रसार विभाग प्रयत्नशील है। हमें संगठन नहीं विमर्श बनाना है। भारत को इंडिया नहीं भारत ही कहा जाए यही हमारा पुण्य प्रयास है।
डॉ अतुल कोठारी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि 2 जुलाई, 2004 को शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की स्थापना माननीय दीनानाथ बत्रा जी के कर कमलों से स्थापना के समय से ही प्रचार और संपर्क एक दूसरे के पर्याय हैं। शिक्षा नीति निर्माण में हमारे पुण्य प्रयासों को शिक्षा जगत से ही प्रोत्साहन मिल रहा है। हम चार कदम आगे हैं तो हमारी बात सुनी जाती है। विगत वर्ष नवंबर में कालड़ी में परम पूजनीय मोहन राव भागवत जी, सर संघचालक , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रेरक पाथेय कण प्राप्त हुए।
विमर्श के युद्ध में शिक्षा के माध्यम से सही छवि समाज के सम्मुख जाए। माननीय दीनानाथ बत्रा जी कहा करते थे कि अपनी लकीर लंबी करो। अपने पुण्य प्रयासों को बढ़ाओ। आपके पुण्य प्रयासों का प्रकाश असत्य के अंधेरे को मिटा देगा। आवश्यक है कि कार्यकर्ता संगठन का संपूर्ण रूप से जानकार हो। संगठन के साहित्य का अधिक से अधिक अध्ययन किया जाए। उन्होंने बताया कि भारतवर्ष में 25 विश्वविद्यालय के नाम के साथ भारत का नाम संलग्न हो गया है। यह भी विमर्श बदलने का एक बड़ा कार्य है।
संजय स्वामी जी ने कहा कि प्रचार प्रसार द्वारा कार्य को दो दूनी चार करना संभव हो सकता है। त्रिभाषा सूत्र, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के स्थापना दिवस पर क्षेत्र एवं प्रांत में पत्रकार वार्ता आयोजित की जानी चाहिए।
ए विनोद जी ने अपने समापन उद्बोधन में कहा कि सूचना संप्रेषण राष्ट्रप्रेमी विमर्श का साधन हो। विचारों की प्रस्तुति का गुणात्मक प्रयास हो। महापुरुषों के विचारों का संप्रेषण आवश्यक है।राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का निरर्थक विरोध ना हो। चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में तथा न्यायालय में मातृभाषा का प्रयोग हमारे ही पुण्य प्रयासों का प्रतिफल है। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने 67 विश्वविद्यालय ,महाविद्यालय विद्यालयों में, अनेक प्रांतों में ज्ञानोत्सव का सफल आयोजन किया गया।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संपूर्ण भारतवर्ष के प्रचार प्रसार के क्षेत्र संयोजकों, प्रांत संयोजकों ने कार्यशाला में प्रतिभाग किया।
