गुलाल भरी एक चुटकी से रीझें चौसट्ठी देवी, वर्षों की परंपरा का आज भी पूरी किया जाता है निर्वहन

बृज बिहारी दुबे
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वाराणसी। 500 वर्षों से भी अधिक पुरानी उस परंपरा से जिससे बंधे काशीवासी पीढिय़ों से हर होली उत्सव की धूलिवंदन तिथि अर्थात चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंग फाग के बाद देवी चौसट्ठी का दरबार जगाते हैं ।  बंगाली टोला की सकरी गलियों में स्थित उनके देवालय में जाकर श्रीचरणों को अबीर-गुलाल से पखार भय, बाधा से मुक्ति का वरदान पाते हैं। अष्टधातु की प्रतिमा के रूप में काल भैरव व एकदंत विनायक के साथ भद्र काली के सम्मुख विराज रही देवी चौसट्ठी ने चूंकि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को ही अपनी पीठिका ग्रहण की थी अतएव लोक मान्यताओं ने धूलिवंदन की इस विशेष तिथि को देवी के अनुरंजन तिथि के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। महादेव के जटाजूट के आघात से प्रकट चौंसठ योगिनियों के वंदन-अभिनंदन से जो स्वत: तंत्र स्वरूपा हैं जिनका आराधन समस्त तांत्रिक बाधाओं के शमन का सहज-सरल समाधान बताया गया है। पुरखों-पुरनियों से सुनी गई सिद्धपीठ की महिमा कथाओं के मुताबिक अभी 18वीं सदी के उत्तराद्र्ध तक पीठ का वैभव परम ऐश्वर्यशाली हुआ करता था। न सिर्फ शहर से अपितु ग्राम्यांचलों से भी धूलिवंदन के लिए होली के  दिन गाजे-बाजे के साथ श्रद्धालुओं के जत्थे चौसट्ठी यात्रा के लिए निकलते थे और देवी के दरबार में रौनकों के उत्सवी रंग भरते थे। लोकाचारी मान्यताओं के अनुसार चौसट्ठी देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाए बगैर काशी में रंगोत्सव की पूर्णता ही नहीं मानी जाती है। ...तो आइये इस बार रंगोत्सव पर आप भी इस धरोहरी परंपरा को अपनी श्रद्धा से सजाइए। बंगाली टोला की गलियों या फिर चौसट्ठी घाट की पथरीली सीढिय़ों को अबीर-गुलाल से पाटते हुए चौसट्ठी मंदिर में देवी के श्री चरणों में एक चुटकी गुलाल अर्पित कर अक्षय पुण्य के भागीदार बन जाइए। 
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