जब हृदय में नि:स्वार्थ करुणा का भाव जागृत होता है, तो मनुष्य दिव्य गुना का पात्र बन जाता है: लक्ष्मी सिन्हा

बृज बिहारी दुबे
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बिहार। करुणा और प्रसन्नता मानव जीवन के आत्मविकास के दो महत्वपूर्ण सोपान है। मनुष्य का सच्चा विकास तभी संभव है, जब वह अपने व्यक्तिगत सुख-दुख की सीमाओं से ऊपर उठकर दूसरों के जीवन से जुड़ना सीखे। यह बातें अखिल विश्व सत्य सनातन संघ की प्रदेश अध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ) श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने बोधगया स्थित सरस्वती कमेटी हाल मैं एक धार्मिक कार्यक्रम के संबोधन में कहा उन्होंने आगे विस्तार से समझाते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को उन्नति के मार्ग पर ले जाना चाहता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह दूसरों के सुख-दुख को अपना मानकर बिना किसी स्वार्थ के उनका सहयोग करें। यही सच्ची सेवा है और यह आत्मविकास की पहली सीढ़ी भी है। जब हृदय में नि:स्वार्थ करुणा का भाव जागरूक होता है, तो मनुष्य दिव्य गुणों का पात्र बन जाता है। त्याग और सेवा का यह भाव एक ऐसी मधुर अनुभूति देता है, जो किसी सांसारिक भोग से संभव नहीं। महात्मा बुद्ध ने जब करुणा को जीवन का आधार बनाया, तो उनका व्यक्तित्व राजकुमार से बढ़कर लोकनायक के रूप में उभरा। भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान आम लोगों के दुखों  को अपना मानकर उनकी सेवा की, तभी वे 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहलाए। करुणा और प्रसन्नता हमारी आंतरिक संपत्ति है।ये भितर के संस्कारों और दृष्टिकोण से प्रकट होती हैं। जब ये भाव हृदय में उत्पन्न होती है तो मनुष्य की दृष्टि क्षणिक भोग की वास्तुओं से हटकर शाश्वत शांति की ओर मुड़ जाति है। धीरे-धीरे सांसारिक इच्छाओं की अगि्न शांन होने लगती है और आत्मा-परमात्मा के बोध का अनुभव होता है। आगे श्रीमती सिन्हा ने कहा कि इस संसार के नश्वर भोग पदार्थ अधूरे और क्षणभंगुर होते हैं। जो व्यक्ति इन्हें अपना लेता है, वह भीतर से संतुष्ट और बाहर से उदार बन जाता है। इसलिए हमें जीवन का आधार सेवा, त्याग और करूणा  को बनाना चाहिए। यही आत्मविकास का सच्चा मार्ग है और यही अध्यात्म का सार भी करुणा और प्रसन्नता का यह संदेश हमें यह सिखाता है कि सच्चा सुख दूसरों की भलाई में है, जो  कि मानवता के लिए अत्यंत आवश्यक।

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