उत्तर प्रदेश 2027 चुनाव: लोकतंत्र के 'चौथे स्तंभ' की निर्णायक भूमिका और अनदेखी:

बृज बिहारी दुबे
By -
एके बिंदुसार संस्थापक 
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी नई दिल्ली।


किसी भी जीवंत लोकतंत्र में मीडिया को 'चौथा स्तंभ' कहा जाता है, और सामाजिक कार्यकर्ता समाज की अंतरात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं। विडंबना यह है कि जब भी चुनाव आते हैं, उनकी सुरक्षा, कल्याण और उनके लिए विशिष्ट योजनाओं का मुद्दा राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे से गायब रहता है, जैसा कि आपने बिहार विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भी नोट किया है।
यह सवाल बहुत जायज है कि क्या देश में पत्रकारों, मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कोई स्थान नहीं है? उनकी आवाज को चुनावी घोषणापत्रों में जगह क्यों नहीं मिलती, जबकि वे जनमत निर्माण और सरकार की जवाबदेही तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
 चुनावी एजेंडे में पत्रकारों की उपेक्षा: एक गंभीर चुनौती
राजनीतिक दल अक्सर उन वर्गों को सीधे लाभ देने वाली योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिनका वोट बैंक बड़ा होता है। पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता एक संगठित वोट बैंक के रूप में नहीं देखे जाते, जिस कारण उनकी मांगों को नजरअंदाज किया जाता है।
  बिहार का उदाहरण: बिहार सहित देश के कई राज्यों में, हमने देखा है कि राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में किसान, युवा, महिला, मजदूर और जातीय समूहों के लिए विस्तृत योजनाएँ शामिल होती हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए कल्याण बोर्ड, बीमा, या सुरक्षा कानून जैसे विषयों पर चुप्पी छाई रहती है।
 सुरक्षा का अभाव: देश भर में पत्रकारों पर हमले, झूठे मुकदमे और उन्हें धमकाने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों के साथ।
 उत्तर प्रदेश 2027: पत्रकारों की भूमिका और नई दिशा की मांग
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और 2027 के विधानसभा चुनाव देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे। इस बड़े मंच पर पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगी:
1. जनमत निर्माण और जागरूकता
उत्तर प्रदेश की राजनीति अत्यधिक जटिल है। पत्रकार और मीडियाकर्मी स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मुद्दों को आम जनता तक पहुँचाने, सरकारी दावों की पड़ताल करने (Fact-Checking), और सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) को आकार देने में निर्णायक होंगे। उनकी रिपोर्टिंग ही मतदाताओं को सही और गलत के बीच फर्क करने में मदद करेगी।
2. भारतीय मीडिया फाउंडेशन की मुखर मांगें
भारतीय मीडिया फाउंडेशन  के नेतृत्व में मीडियाकर्मियों की मांगों को जोरदार ढंग से उठाया जा रहा है। ये मांगें सिर्फ पत्रकारों के हित तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक हैं:
  मीडिया पालिका की स्थापना: सभी राज्यों में मीडिया कल्याण बोर्डों की स्थापना की मांग, जो पत्रकारों के कल्याण, पेंशन और बीमा योजनाओं का प्रबंधन करे।
 पत्रकार सुरक्षा कानून: पत्रकारों को शारीरिक हमलों, धमकी और झूठे मुकदमों से बचाने के लिए एक मजबूत केंद्रीय/राज्य पत्रकार सुरक्षा कानून को लागू करना।
  कल्याणकारी योजनाएँ: स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा, और आपातकालीन सहायता कोष जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना।
3. सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता
सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न आंदोलनों (जैसे किसान आंदोलन, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी) के माध्यम से जनहित के मुद्दों को जमीन से उठाते हैं। वे इन मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाते हैं। 2027 के चुनाव में उनकी सक्रियता राजनीतिक दलों को उन मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर करेगी जिन्हें वे अक्सर दरकिनार कर देते हैं।
 क्या पत्रकार राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं?
हाँ, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रत्यक्ष रूप से चुनाव नहीं जीतते, लेकिन वे अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति को एक नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं।
  दबाव समूह (Pressure Group): अपनी एकजुटता और निरंतर मुखरता के माध्यम से, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजनीतिक दलों पर दबाव समूह का निर्माण कर सकते हैं। वे उन दलों को समर्थन देने का आह्वान कर सकते हैं जो उनके कल्याणकारी एजेंडे को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हैं।
 जवाबदेही सुनिश्चित करना: मीडिया अगर निष्पक्ष और निर्भीक रहकर हर पार्टी की कमियों को उजागर करे, तो यह दलों को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनने के लिए मजबूर करता है।
  मुद्दों का ध्रुवीकरण: वे जाति/धर्म आधारित राजनीति के बजाय विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में लाकर राजनीति के एजेंडे को बदल सकते हैं।
 2027 में अनदेखी नहीं चलेगी
उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव एक ऐसा अवसर हो सकता है जब पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी मांगों को एक निर्णायक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करें।
यदि भारतीय मीडिया फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के नेतृत्व में मीडियाकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता एकजुट होकर किसी भी राजनीतिक दल के सामने यह शर्त रखते हैं कि 'पत्रकार सुरक्षा कानून' और 'मीडिया कल्याण बोर्ड' उनके समर्थन की पूर्व शर्त होंगे, तो राजनीतिक दलों को इन मांगों पर ध्यान देना होगा।
यह सिर्फ पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि स्वस्थ, भयमुक्त और मजबूत लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। 2027 के चुनाव में उनकी भूमिका सिर्फ रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे एक महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में राजनीति को जनहित की दिशा में मोड़ने का प्रयास करेंगे।

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