दुनिया की सबसे महंगी पुस्तक प्रकाशित कर अर्पित सर्वेश ने रचा वैश्विक साहित्यिक इतिहास

बृज बिहारी दुबे
By -


विश्व रिकॉर्ड धारक एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार अर्पित सर्वेश ने एक बार फिर साहित्य जगत में ऐसा अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसने न केवल भारतवर्ष बल्कि संपूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। तीन अलग-अलग भाषाओं—हिंदी, मराठी और अंग्रेज़ी—में अपनी पुस्तकों का प्रकाशन कर उन्होंने उन्हें दुनिया की सबसे महंगी पुस्तकों की श्रेणी में स्थापित कर दिया है। यह उपलब्धि केवल मूल्य के कारण नहीं, बल्कि अपने विचार, दर्शन और दृष्टि के कारण साहित्य के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज की जा रही है।

यह कीर्तिमान भारतीय साहित्य के लिए गर्व का विषय है, क्योंकि इसके माध्यम से यह सिद्ध हुआ है कि भारतीय लेखक न केवल वैचारिक रूप से समृद्ध हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर साहित्य की दिशा तय करने की क्षमता भी रखते हैं। अर्पित सर्वेश की यह उपलब्धि भारतीय रचनात्मकता, साहस और नवाचार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई ऊँचाइयों तक ले जाने वाली मील का पत्थर बन चुकी है।

साहित्य केवल शब्द नहीं, विचारों की अमूल्य धरोहर

अर्पित सर्वेश की यह ऐतिहासिक पहल केवल पुस्तकों के मूल्य निर्धारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपी हुई वह गहरी सोच है, जो साहित्य को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की प्रक्रिया मानती है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि साहित्य शब्दों का संग्रह मात्र नहीं, बल्कि विचारों की वह शक्ति है जो समय, समाज और सीमाओं से परे जाकर मानव चेतना को जाग्रत करती है।

उनकी यह पहल इस धारणा को चुनौती देती है कि साहित्य का मूल्य केवल उसकी बिक्री या लोकप्रियता से आँका जाए। अर्पित सर्वेश के अनुसार, साहित्य का वास्तविक मूल्य उसके प्रभाव, उसकी प्रेरणा और उसकी वैचारिक गहराई में निहित होता है। यही कारण है कि उनकी पुस्तकों का मूल्य प्रतीकात्मक रूप से उस विचार की महत्ता को दर्शाता है, जिसे वे समाज तक पहुँचाना चाहते हैं।

हिंदी साहित्य में दार्शनिक शिखर: मै क्यों हूं

हिंदी भाषा में प्रकाशित उनकी पुस्तक “मै क्यों हूं” की कीमत ₹51,99,999 निर्धारित की गई है। यह पुस्तक आत्मबोध, अस्तित्व और जीवन-दर्शन पर आधारित एक गहन वैचारिक कृति है। इसमें लेखक ने मानव जीवन के उद्देश्य, आत्मा की पहचान, संघर्ष, पीड़ा, सफलता और आत्मज्ञान की यात्रा को अत्यंत गंभीर एवं साहित्यिक शैली में प्रस्तुत किया है।

यह पुस्तक पाठक को स्वयं से संवाद करने के लिए विवश करती है। यह केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। “मै क्यों हूं” व्यक्ति को उसके अस्तित्व के मूल प्रश्नों से रूबरू कराती है—मैं कौन हूं, मेरा उद्देश्य क्या है, और मेरा जीवन किस दिशा में जा रहा है। हिंदी साहित्य में इस प्रकार की दार्शनिक गहराई और साहसिक प्रस्तुति विरले ही देखने को मिलती है।

मराठी साहित्य में नवीन प्रयोग: मी का आहे

मराठी भाषा में प्रकाशित पुस्तक “मी का आहे”, जिसकी कीमत ₹21,99,999 रखी गई है, मराठी साहित्य में एक नवीन और साहसिक प्रयोग के रूप में देखी जा रही है। इस कृति में क्षेत्रीय भाषा की सरलता और लोकभावना के साथ गहरे दार्शनिक विचारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

यह पुस्तक यह प्रमाणित करती है कि भारतीय क्षेत्रीय भाषाएँ किसी भी प्रकार से वैश्विक विमर्श से कमतर नहीं हैं। “मी का आहे” मराठी भाषी पाठकों के लिए केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि गर्व और आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुकी है। यह कृति दर्शाती है कि भारतीय भाषाओं में वह सामर्थ्य है जो वैश्विक साहित्यिक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकती हैं।

वैश्विक मंच पर भारतीय दर्शन: Why Am I?

अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित पुस्तक “Why Am I” की कीमत ₹99,99,999 रखी गई है, जो इसे विश्व की सबसे महंगी पुस्तकों में शीर्ष स्थान दिलाती है। यह पुस्तक अंतरराष्ट्रीय पाठक वर्ग के लिए भारतीय दर्शन, आत्मअन्वेषण और जीवन के गूढ़ सत्यों का द्वार खोलती है।

इस कृति के माध्यम से अर्पित सर्वेश ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय दर्शन केवल प्राचीन ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक संदर्भों में भी उतना ही प्रासंगिक और प्रभावशाली है। साहित्यिक विशेषज्ञों का मानना है कि “Why I Am” वैश्विक साहित्यिक विमर्श में भारतीय दृष्टिकोण को सशक्त रूप से प्रस्तुत करने वाली एक क्रांतिकारी कृति है।

मूल्य नहीं, दृष्टिकोण का परिवर्तन

इन पुस्तकों के अभूतपूर्व मूल्य निर्धारण ने वैश्विक साहित्य जगत में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। साहित्यिक आलोचकों, विद्वानों और पाठकों का मानना है कि यह केवल कीमत का विषय नहीं, बल्कि साहित्य के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन का संकेत है। अर्पित सर्वेश ने यह साहसिक कदम उठाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि साहित्य की वास्तविक कीमत उसके विचारों, प्रभाव और प्रेरणा में निहित होती है।

उनकी यह पहल साहित्य को केवल उपभोग की वस्तु से उठाकर वैचारिक धरोहर के रूप में स्थापित करती है।

प्रतापगढ़ से विश्व पटल तक का सफर

अर्पित सर्वेश इससे पूर्व भी कई बार विश्व रिकॉर्ड स्थापित कर चुके हैं और साहित्य के क्षेत्र में नए मानदंड तय किए हैं। उन्होंने अपने लेखन, प्रयोगधर्मिता और आत्मविश्वास के बल पर प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश और पूरे भारत का नाम राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है।

उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर, संसाधन या मंच की मोहताज नहीं होती। सच्ची लगन, निरंतर अभ्यास और आत्मविश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थान से विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकता है।

परिवार: सफलता की सबसे बड़ी पूँजी

अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय अर्पित सर्वेश ने अपने पिता डॉ. संतोष शुक्ल, माता अनीता शुक्ला, अपनी भतीजी ईशा शुक्ला तथा अपनी प्रकाशक नसेहा जी को दिया है। उन्होंने कहा कि परिवार का निरंतर सहयोग, विश्वास और आशीर्वाद उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति रही है।

उनके अनुसार, जब परिवार साथ खड़ा होता है, तो असंभव भी संभव प्रतीत होने लगता है। यही पारिवारिक समर्थन उन्हें हर बार नई ऊँचाइयों तक पहुँचने की प्रेरणा देता है।

प्रेरणा का स्रोत, साहित्यिक क्रांति के अग्रदूत

आज अर्पित सर्वेश केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक विचारक, प्रेरक और साहित्यिक क्रांति के अग्रदूत के रूप में देखे जा रहे हैं। उनकी यह ऐतिहासिक उपलब्धि युवाओं के लिए यह संदेश देती है कि यदि सपने बड़े हों, सोच मौलिक हो और इरादे अडिग हों, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

अर्पित सर्वेश द्वारा प्रकाशित दुनिया की सबसे महंगी पुस्तकों का यह अध्याय भारतीय साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी और यह प्रमाणित करेगी कि भारतीय साहित्य में आज भी वह सामर्थ्य है, जो विश्व को दिशा और दृष्टि प्रदान कर सकता है।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn more
Ok, Go it!